नई नस्लों को बर्बादी का मंजर देके जाते हैं
कलम वो छीनकर हाथों में खंजर देके जाते हैं

वहां जल्लाद लोगों के लबों पर मुस्कुराहट है
जहां इंसानियत को जख्म पत्थर देके जाते हैं

नहीं पहुंचेंगे मंजिल पर कभी वह कामयाबी के
जो बुड्ढी मां की आंखों में समंदर देके जाते हैं

तबस्सुम उनके होटों पर कभी देखा नहीं हमने
हो जिनकी आंख में आंसू मुकद्दर देके जाते हैं

समंदर क्या बिगाड़ेगा भला अज्में मुसम्म* का
यही पैगाम साहिल पर शलावर** देके जाते हैं

जिसे में ‘राज’ रखता हूं छुपा कर दिल के गौसे में
मुझे वह दर्द की सौगात अक्सर देके जाते हैं

लेकख – भरत ‘राज़’

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