आरक्षण एक ऐसा शब्द है, जिसका नाम हर दूसरे व्यक्ति के मुह पर है, अर्थात् आरक्षण भारत मे, बहुत चर्चा मे है . वैसे तो हम, इक्कीसवी सदी मे जी रहे है और अब तक आरक्षण कि ही, लड़ाई लड़ रहे है .
हाल ही में मोदी जी ने राजनीति का सबसे बड़ा दाव खेला सवर्णों वर्ग को 10% का आरक्षण इस आरक्षण के बहुत से मायने हो सकते है यह पहल आर्थिक असमानता के साथ ही जातीय भेदभाव को दूर करने की दिशा में भी एक अच्छा व ठोस कदम है। इसका फैसले का स्वागत इसलिए होना चाहिए, क्योंकि यह उन सवर्णों के लिए एक बड़ा सहारा है, जो आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद आरक्षित वर्ग की सुविधा पाने से वंचित हैं। इस वजह से वे खुद को बिल्कुल कमजोर सा महसूस करते है उनके मन में आरक्षण व्यवस्था को लेकर असंतोष भी उपज रहा था। इस स्थिति को दूर करना सरकार का नैतिक दायित्व था।
पर इस फैसले को लोकसभा चुनाव से पहले आना भी राजनीतिक हित को प्रदर्शित करता है ।
प्रधानमंत्री मोदी जी से पहले 1991 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने गरीब सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया था। लेकिन साल 1992 में इसे असंवैधानिक करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।
अब वर्तमान में लोकसभा में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए लाया गया संविधान (124वां संशोधन) विधेयक पारित हो गया है.
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया था कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग या इनके अलावा किसी भी अन्य विशेष श्रेणी में दिए जाने वाले आरक्षण का कुल आंकड़ा 50 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं होना चाहिए। ऐसे में एसटी, एससी और ओबीसी के 7.5 % + 15 % + 27% आरक्षण को मिलाकर 49.5 % होते हैं।
अब देखना दिलचस्प होगा कि यह लागू हो पाता है या नहीं।
(नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं इस लेख के किसी मतभेद लिए मरुधर भारती जिम्मेदार नहीं हैं।)

महिपाल चौधरी
विधार्थी (राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर)

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