Loksabha Election 2019: 15 मुद्दे, जिनपर होगा सत्ता और विपक्ष में वार-पलटवार

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नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के लिए तारीखों की घोषणा हो चुकी है। पिछली बार के मुकाबले इस बार 7 फेज में चुनाव कार्यक्रम सम्पन्न कराया जाएगा। ऐसे में राजनीतिक दलों ने भी कमर कस ली हैं। यूं तो सभी राजनीतिक दल अपनी सहूलियत और अपने वोटर्स को ध्यान में रखते हुए अपने चुनावी मुद्दों का चयन करेंगे, लेकिन फिर भी कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिनका सरोकार देश के हर नागरिक से हैं। ये वो मुद्दे हैं, जो चुनाव परिणाम को भी काफी हद तक प्रभावित करेंगे। कौन से हैं वे मुद्दे… आइए जानते हैं:

राष्ट्रीय सुरक्षा/आतंकवाद
1990 के समय से ही चुनावों में राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद बड़े मुद्दों में शुमार रहा है, लेकिन इस बार यह मुद्दा हाल ही में हुए पुलवामा हमले के पहले चुनाव के केंद्र में नहीं था। पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों की शहादत और उसके बाद भारतीय वायु सेना की तरफ से पाकिस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राइक के बाद यह मुद्दा ऐसे मुकाम पर भी आ गया है कि यह चुनाव की दिशा भी बदल सकता है। यह मुद्दा बीजेपी को बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभा सकता है। बीजेपी यह दिखाने की कोशिश करेगी कि नरेंद्र मोदी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं, जो कठोर फैसले लेकर पाकिस्तान और आतंकवाद से मुकाबला कर सकते हैं।

महंगाई
आम तौर पर किसी भी चुनाव में महंगाई सबको प्रभावित करने वाला मुद्दा रहा है, लेकिन इस चुनाव में यह मुद्दा उतना जोर पकड़ता नहीं दिख रहा है। मोदी सरकार कहीं न कहीं महंगाई पर लगाम लगाने में कामयाब रही है। विपक्षी पार्टियां चाहकर भी महंगाई के मुद्दे पर बीजेपी को घेर नहीं सकी हैं। वहीं कुछ जानकारों का कहना है कि महंगाई पर लगाम लगाने का एक बड़ा कारण यह है कि किसान से कम दाम पर ही सामान सामान खरीदा गया। ऐसे में महंगाई कंट्रोल करने में तो भले ही कामयाबी मिली हो, लेकिन ग्रामीण इलाकों में पार्टी को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

नौकरी
मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के तरकश में ‘रोजगार’ का तीर सबसे अहम है। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां सरकार को कई बार इस मुद्दे पर घेर चुकी हैं। मोदी सरकार को 2014 में नौकरियों का वादा करने पर बड़ी सफलता मिली थी, लेकिन कहीं न कहीं वह इस वादे को पूरा करने में सफल नहीं दिख रहे हैं। सरकार पर डेटा में हेरफेर कर इस मुद्दे के प्रति गंभीरता नहीं बरतने का आरोप भी लगता रहा है। सरकार ने ईपीएफओ नंबर बढ़ने और मुद्रा लोन की संख्या बढ़ने का हवाला देकर रोजगार का वादा पूरा करने के सबूत देने की कोशिश की है, लेकिन विपक्ष इससे कहीं भी सहमत नहीं है।

गांव, किसान का मुद्दा 
किसान- या कहें कि ग्रामीण वोटर्स- ने 2014 में मोदी सरकार की जीत में बड़ा रोल निभाया था। वहीं इस बार कृषि निवेश में बेहतर रिटर्न न मिलने से ग्रामीण वोटरों में नाराजगी है। नोटबंदी जैसे कदमों ने इस मुद्दे को अहम बना दिया है। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के चुनाव में कांग्रेस ने इस मुद्दे का पूरा फायदा उठाने की कोशिश की और उन्हें सफलता भी मिली। इसके बाद बीजेपी ने कई और रास्तों से किसानों की मदद कर इस कमी को पूरा करने की कोशिश की है।

ध्रुवीकरण
जितना ध्रुवीकरण इन चुनावों में नजर आ रहा है, उतना देश में पहले कभी नहीं दिखा। इसने 2014 में बीजेपी को सबसे बड़ी मदद की थी और कांग्रेस को हाशिए पर धकेल दिया था। कांग्रेस की ‘अल्पसंख्यक समर्थक’ पार्टी की इमेज से उसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। आम तौर पर इसका फायदा हिंदू राष्ट्रवादी बीजेपी को मिलता है।

जातीय समीकरण
भारत में अब तक हुए चुनावों में जातीय समीकरण के आधार पर किसी भी पार्टी की मजबूती का अंदाजा लगाना बेहद आसान रहा है। लेकिन इस बार का चुनाव इस मामले पर काफी अलग रहने वाला है। विपक्ष मोदी को हराने के लिए इस बार जातीय समीकरण को आधार बना रहा है। विपक्ष का मानना है कि यूपी में यादव, जाटव और मुसलमान के साथ आने से बीजेपी के हराना काफी आसान होगा। वहीं बिहार में कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने लालू के साथ गठबंधन कर ओबीसी और मुसलमान वोटों के भी एकजुट करने की कोशिश की है। बीजेपी को 2014 में बड़ी जीत इसलिए मिली थी क्योंकि मोदी कुछ उन जातियों का भी समर्थन मिला था, जिन्हें आम तौर पर विपक्षी पार्टियों का आधार माना जाता है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी को मिली हार के पीछे तथ्य दिए गए कि उच्च वर्ग बीजेपी से दूर हो रहा है। ऐसे में बीजेपी ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्हें अपने खेमे में बनाए रखने की कोशिश की है।

भ्रष्टाचार
2014 के चुनाव में कांग्रेस को इससे सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था। इसके बाद ही कांग्रेस को अब तक की सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। पीएम मोदी ने अपने कार्यकाल में पूरी कोशिश की है कि बीजेपी पर ऐसे आरोप न लग पाएं। यहां तक कि पीएम ने कई जगहों पर यह कहा भी कि उनके कार्यकाल में उनकी सरकार भ्रष्टाचार का कोई भी आरोप नहीं लगा है। लोगों ने नोटबंदी के कड़वे घूंट को भी इसलिए आसानी से पी लिया क्योंकि उन्हें लगता है कि पीएम भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए यह कदम उठा रहे हैं। हालांकि अभी तक इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि राहुल गांधी की तरफ से लगाए जा रहे राफेल घोटाले के आरोपों का जनता पर क्या असर पड़ेगा।

सोशल मीडिया
इस मुद्दे की साल 2014 में पहली बार ऐंट्री हुई। यह चुनाव में एक अहम खिलाड़ी की तरह नजर आया। एजेंडा सेट करने में सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया गया। पांच साल पहले मोदी की जीत का सबसे बड़ा श्रेय सोशल मीडिया को ही दिया गया। इसके बाद कांग्रेस ने भी इस कमी को पूरा करने की कोशिश की। कांग्रेस को इस मोर्चे को संभालने में समय लगा, लेकिन वह अब बेहद प्रभावी ढंग से आ गई है।

कल्याणकारी स्कीम्स
मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में बहुत सारी कल्याणकारी और विकास योजनाओं को लॉन्च किया। उज्जवला, स्वच्छ भारत, पीएम किसान, आयुष्मान भारत इसमें प्रमुख हैं। वहीं नोटबंदी जैसे कदम ने भी ‘सूट बूट की सरकार’ के लेबल लगे विपक्ष को झटका देने में मदद की है। हाल में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बढ़त मिली है। इसके बाद उन्होंने लोगों को रिझाने के लिए तीन राज्यों में कर्जमाफी की घोषणा भी कर दी है। राहुल ने सरकार में आने के बाद बेसिक इनकम देने का वादा भी किया है। यह कांग्रेस का फायदा करवा सकता है।

मोदी फैक्टर
भारतीय जनता पार्टी को यकीन है कि अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी पीएम मोदी की गुडविल को वोटों में तब्दील करने में कामयाब होगी। बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद बीजेपी का उत्साह और बढ़ गया है। वहीं कांग्रेस मानकर चल रही है कि मोदी का करिश्मा अब 2014 जैसा नहीं है क्योंकि चुनावी वादे पूरे ही नहीं हुए। कांग्रेस की कैपेनिंग मोदी सरकार द्वारा पूरे न किए गए वादों पर ही होगी जिससे ब्रैंड नमो का ‘जादू’ कम हो। कांग्रेस के लिए यह जरूरी भी है क्योंकि पिछले कुछ विधानसभा चुनावों में बीजेपी के खिलाफ वोट देनेवाले लोगों ने भी साफतौर पर कहा था कि वह लोकसभा में तो मोदी को ही वोट देंगे।

गौरक्षा
2014 के चुनाव में बीजेपी ने अवैध गौहत्या पर बैन लगाने की बात कही थी। इसने पार्टी के फेवर में काम तो किया लेकिन इसके लागू होने के बाद भी लोगों में नाराजगी रही। यह नाराजगी खेती के जरिए अपना घर चला रहे किसानों में दिखी। दूसरी तरफ अवैध गौहत्या पर बैन से मुस्लिम समाज के लोग भी नाराज हो गए। नुकसान की पूर्ति के लिए सरकार ने गौ संरक्षण केंद्र बनाने की बात कही, लेकिन इसका कितना फायदा होगा यह कहा नहीं जा सकता। साफ है कि किसानों को गौ रक्षा से दिक्कत नहीं है, लेकिन वह अपने हिस्से का फंड उधर नहीं जाने देना चाहेंगे।

स्थिर और मजबूत नेता बनाम विविधता और साझा लीडरशिप
2014 की तरह यह चुनाव भी बीजेपी नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ेगी। वहीं विपक्षी गठबंधन दिखाना चाहेगा कि लोकतंत्र में साक्षे तरीके से कामों को बांटकर किया जाना चाहिए। बीजेपी यह मुद्दा भी उठाएगी कि विपक्षी पार्टियों के पास पीएम के लिए कोई चेहरा ही नहीं है। वहीं कांग्रेस इसका बचाव करते हुए कह सकती है कि गठबंधन भारत के विविध समाज के लिए बेहतर है।

युवा वोटर
युवा वोटर्स इस चुनाव में अहम भूमिका निभाने वाले हैं। जो पार्टी नई शुरुआत करके युवाओं के लिए नए वादे लेकर आएगी युवा उसकी तरफ आकर्षित हो सकते हैं। माना जा रहा है सोशल मीडिया के जरिए मुद्दों पर बारीक नजर रख रहे युवा काफी समझदारी से किसी को चुनेंगे। अगर यह माना जाए कि पहली बार वोट डाल रहे शख्स को फिलहाल रोजगार की उतनी चिंता नहीं होगी तो वह अन्य चीजों से भी प्रभावित हो सकता है। जैसे वह उस संगठन की तरफ जा सकते हैं जिससे वह पहले से जुड़े हुए हैं।

महिलाएं
देश की आधी आबादी यानी महिलाएं इस चुनाव में अहम भूमिका में होंगी। केंद्र सरकार ने टॉइलेट निर्माण, एलपीजी गैस की सुविधा और बलात्कार के मामलों पर सख्ती जैसे कदम उठाए हैं। इससे उन्हें महिलाओं का वोट मिलने का भरोसा है। बड़े नेता एमजीआर, एनटीआर, जयललिता से लेकर शिवराज सिंह चौहान और नीतीश कुमार को अबतक महिलाओं का जबरदस्त सपॉर्ट मिला है।

दलित और आदिवासी
रोहित वेमुला की आत्महत्या से लेकर ऊना में गौरक्षकों द्वारा दलितों की पिटाई तक सरकार निशाने पर रही है। फिर एससी-एसटी ऐक्ट पर हुए विवाद के बाद दलितों का यह गुस्सा और बढ़ गया। अब छत्तीसगढ़ में बीजेपी की हार और झारखंड में आदिवासियों को वन भूमि से बेदखली के फैसले से सरकार के लिए राह आसान नहीं होगी।

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