नई दिल्ली। महागठबंधन का नारा अब क्या खत्म मान लेना चाहिए.। शायद हां। बसपा नेत्री मायावती के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार को साफ कर दिया है कि चुनाव में वह कांग्रेस से अलग है। उनकी जंग न सिर्फ भाजपा और राजग से होगी बल्कि कांग्रेस से भी होगी। जाहिर है कि सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और तीसरे बडे राज्य पश्चिम बंगाल में संभावित सहयोगियों के रुख ने न सिर्फ महागठबंधन को खारिज कर दिया है बल्कि कांग्रेस के लिए दूसरे राज्यों मे भी चुनौतियां बढ़ा दी हैं। खासकर बिहार में इसका असर दिख सकता है।

भाजपा के खिलाफ विपक्ष का बड़ा धड़ा बनाने की कांग्रेस की मुहिम संकट में पड़ती दिख रही है और ‘फ्रंट फुट’ पर खेलने की रणनीति भी। गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में दस सीटों पर अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया था। खासकर सपा की अंदरूनी चाहत को देखते हुए यह सीधा सीधा संदेश था कि बसपा-सपा गठबंधन इन सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी माने या फिर इसके लिए तैयार रहे कि कांग्रेस फ्रंट फुट पर खेलेगी और उसका नुकसान न सिर्फ भाजपा को उठाना होगा बल्कि गठबंधन को भी।

मंगलवार को खुद बसपा नेत्री मायावती ने स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस के साथ किसी भी राज्य में कोई समझौता नहीं होगा। ध्यान रहे कि बसपा सपा गठबंधन मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब मे भी दावा ठोक रहा है। मायावती का यह रुख चुनाव से पहले भी बहुत कुछ कहता है और चुनाव बाद की स्थिति में भी अटकलें लगाने की खुली राह छोड़ता है।

दूसरी ओर पिछले एक साल से लगातार विपक्षी दलों की बैठक में शामिल हो रहीं और अपने मंच पर कांग्रेस समेत दूसरे दलों को आने के लिए बाध्य कर रहीं ममता बनर्जी ने बंगाल की सभी 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। वहां कांग्रेस और वामदलों के बीच सामंजस्य तैयार हो रहा है। हालांकि यह सवाल भी छोड़ रहा है कि क्या केरल में मुख्य प्रतिद्वंद्वी वाम और कांग्रेस एक दूसरे से हाथ मिलाएंगे। यह तय हो गया है कि बंगाल में भी त्रिकोणीय लड़ाई होगी और उत्तर प्रदेश में भी। यह भी याद रहे कि एक महीने पहले संसद सत्र के दौरान जब कांग्रेस सांसदों ने सारधा चिटफंड का मामला उठाया था तो ममता ने खुद संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी से कहा था- ‘मैं याद रखूंगी।’

रही बात बिहार की तो वहां अभी तक राजद-कांग्रेस के बीच सीटों का बंटवारा नहीं हो पाया है। बताया जा रहा है कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने सहयोगी दलों को साफ संकेत दे दिया है कि वह अपनी राजनीतिक हैसियत से ज्यादा न मांगे, पहले पहलवान(मजबूत उम्मीदवार) दिखाएं फिर सीटों की बात करें। यह बयान कांग्रेस के लिहाज से इसलिए अहम है क्योंकि पार्टी ने वहां 15 सीटों से मांग शुरू की थी और अब संभवत: 12 पर आकर टिकी है। जबकि राजद कांग्रेस को 8-9 सीटें देना चाहता है।

तेलंगाना विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से साथ मिलकर लड़े आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू का रुख भी अब बदला बदला है। प्रदेश की जनता को वह बताते फिर रहे है कि कांग्रेस के साथ केंद्र की रणनीति अलग है लेकिन राज्य के विधानसभा चुनाव में उनका कांग्रेस के साथ कोई लेना देना नहीं है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच समझौते को अभी तक खारिज ही किया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि विपक्षी दलों का एक मेनीफेस्टो तैयार करने की जो कवायद शुरू हुई थी अब उसका क्या होगा। ध्यान रहे कि अब तक विपक्षी दलों के जमावड़े में 21 दलों को गिना जाता था और इसमें बसपा, सपा, तृणमूल, टीडीपी और आप भी शामिल हुआ करती थीं।

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