कला-संस्कृति हो, या व्यापार। चाहे खेल की बात करो या खेती की…। सबसे आगे हैं राजस्थानी। मरूधरा का गर्वीला इतिहास आज भी हर राजस्थानी में  आगे बढऩे का जोश भर रहा है…।यह ही नही राजस्थानीयो को अपने सपनो के पंख भी राजस्थान से सजाये हुए लगते है।

गौरवशाली इतिहास

राजस्थान की धरती पर रणबांकुरों ने जन्म लिया है। यहां वीरांगनाओं ने भी अपने त्याग और बलिदान से मातृभूमि को सींचा है। यहां धरती का वीर योद्धा कहे जाने वाले पृथ्वीराज चौहान ने जन्म लिया, जिन्होंने तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गौरी को पराजित किया।

कहा जाता है कि गौरी ने 18 बार पृथ्वीराज पर आक्रमण किया था जिसमें 17 बार उसे पराजय का सामना करना पड़ा था। जोधपुर के राजा जसवंत सिंह के 12 साल के पुत्र पृथ्वी ने तो हाथों से औरंगजेब के खूंखार भूखे जंगली शेर का जबड़ा फाड़ डाला था।

राणा सांगा ने सौ से भी ज्यादा युद्ध लड़कर साहस का परिचय दिया था। पन्ना धाय के बलिदान के साथ बुलन्दा (पाली) के ठाकुर मोहकम सिंह की रानी वाघेली का बलिदान भी अमर है। जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब से बचाने के लिए वे उन्हें अपनी नवजात राजकुमारी की जगह छुपाकर लाई थीं।

एटमी ताकत का गर्व

जैसलमेर का पोकरण लाल पत्थरों से निर्मित दुर्ग के कारण मशहूर था। अब इसकी पहचान भारत की एटमी ताकत की भूमि के रूप में भी है। यहां पहला भूमिगत परमाणु परीक्षण 18 मई, 1974 को किया गया था। इसके बाद 11 और 13 मई 1998 को भी यहां परीक्षण किए गए।

सात चरणों में बना राजस्थान

17 मार्च 1948 अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली रियासतों का विलय, ‘मत्स्य संघÓ बना, धौलपुर के तत्कालीन महाराजा उदयसिंह राजप्रमुख व अलवर राजधानी बनी।

25 मार्च 1948 कोटा, बूंदी, झालावाड़, टोंक, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, किशनगढ़ व शाहपुरा का विलय, राजस्थान संघ बना।

18 अप्रेल 1948 उदयपुर रियासत का विलय। नया नाम ‘संयुक्त राजस्थान संघÓ। उदयपुर के तत्कालीन महाराणा भूपाल

सिंह राजप्रमुख बने।

30 मार्च 1949 जोधपुर, जयपुर, जैसलमेर और बीकानेर रियासतों का विलय, वृहत्तर राजस्थान संघ बना। यही राजस्थान की स्थापना का दिन माना जाता है।

15 अप्रेल 1949 मत्स्य संघ का वृहत्तर राजस्थान संघ में विलय।

26 जनवरी 1950 सिरोही रियासत को भी वृहत्तर राजस्थान संघ में मिलाया गया।

एक नवंबर 1956 आबू देलवाड़ा तहसील का भी राजस्थान में विलय, मध्यप्रदेश में शामिल सुनेल टप्पा का भी विलय हुआ।

पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार राजस्थान का इतिहास पूर्व पाषाणकाल से प्रारंभ होता है। आज से करीब एक लाख वर्ष पहले मनुष्य मुख्यतः बनास नदी के किनारे या अरावली के उस पार की नदियों के किनारे निवास करता था। आदिम मनुष्य अपने पत्थर के औजारों की मदद से भोजन की तलाश में हमेशा एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते रहते थे, इन औजारों के कुछ नमूने बैराठ, रैध और भानगढ़ के आसपास पाए गए हैं।

अतिप्राचीनकाल में उत्तर-पश्चिमी राजस्थान वैसा बीहड़ मरुस्थल नहीं था जैसा वह आज है। इस क्षेत्र से होकर सरस्वती और दृशद्वती जैसी विशाल नदियां बहा करती थीं। इन नदी घाटियों में हड़प्पा, ‘ग्रे-वैयर’ और रंगमहल जैसी संस्कृतियां फली-फूलीं। यह वही ब्रह्मावर्त है जिसकी महती चर्चा मनु ने की है। यहां की गई खुदाइयों से खासकरकालीबंग के पास, पांच हजार साल पुरानी एक विकसित नगर सभ्यता का पता चला है। हड़प्पा, ‘ग्रे-वेयर’ और रंगमहल संस्कृतियां सैकडों किलोमीटर दक्षिण तक राजस्थान के एक बहुत बड़े इलाके में फैली हुई थीं।

इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि ईसा पूर्व चौथी सदी और उसके पहले यह क्षेत्र कई छोटे-छोटे गणराज्यों में बंटा हुआ था। इनमें से दो गणराज्य मालवा और सिवि इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने सिकंदर महान को पंजाब से सिंध की ओर लौटने के लिए बाध्य कर दिया था। उस समय उत्तरी बीकानेरपर एक गणराज्यीय योद्धा कबीले यौधेयत का अधिकार था। महाभारत में उल्लिखित मत्स्य पूर्वी राजस्थान और जयपुरके एक बड़े हिस्से पर शासन करते थे। जयपुर से 80 कि॰मी॰ उत्तर में बैराठ, जो तब ‘विराटनगर’ कहलाता था, उनकी राजधानी थी। इस क्षेत्र की प्राचीनता का पता अशोकके दो शिलालेखों और चौथी पांचवी सदी के बौद्ध मठ के भग्नावशेषों से भी चलता है।

भरतपुर, धौलपुर और करौली उस समय सूरसेन जनपद के अंश थे जिसकी राजधानी मथुरा थी। भरतपुर के नोह नामक स्थान में अनेक उत्तर-मौर्यकालीन मूर्तियां और बर्तन खुदाई में मिले हैं। शिलालेखों से ज्ञात होता है कि कुषाणकाल तथा कुषाणोत्तर तृतीय सदी में उत्तरी एवं मध्यवर्ती राजस्थान काफी समृद्ध इलाका था। राजस्थान के प्राचीन गणराज्यों ने अपने को पुनर्स्थापित किया और वे मालवा गणराज्य के हिस्से बन गए। मालवा गणराज्य हूणों के आक्रमण के पहले काफी स्वायत्त् और समृद्ध था। अंततः छठी सदी में तोरामण के नेतृत्तव में हूणों ने इस क्षेत्र में काफी लूट-पाट मचाई और मालवा पर अधिकार जमा लिया। लेकिन फिर यशोधर्मन ने हूणों को परास्त कर दिया और दक्षिण पूर्वी राजस्थान में गुप्तवंश का प्रभाव फिर कायम हो गया। सातवीं सदी में पुराने गणराज्य धीरे-धीरे अपने को स्वतंत्र राज्यों के रूप में स्थापित करने लगे। इनमें से मौर्यों के समय में चित्तौड़गुबिलाओं के द्वारा मेवाड़ और गुर्जरों के अधीन पश्चिमी राजस्थान का गुर्जरात्र प्रमुख राज्य थे।

आज भी राजस्थानी संस्कृति व परम्परा देश का गर्व

राजस्थानी वेशभूषा,मारवाडी भाषा ओर रीति रिवाज अपने आप मे एक पहचान है।संस्कृति धरोहर मे एक महत्वपूर्ण स्थान है।राजस्थान मे विश्नोई समुदाय पेड पौधो के लिए अपने आपको को न्योछावर करना एक अनूठा उदाहरण है।यही नही वन्य जीव जन्तु की रक्षा करना अपना धर्म समझते है।यही नही हरे वृक्ष को काटने तक नही देते।विश्नोई समाज गुरू जम्भेश्वर भगवान के अनुयायी है।

रिपोर्ट-ओम पंवार पत्रकार साचौर (9461291829)

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