प्रश्न करने की कला , जिसे उत्सुकता या जिज्ञासा कहते हैं, इसने मानव जाती को असंभव को सम्भव में बदलना सिखाया है। पुराने समय से इंसान ने अपने आस पास की चीजों को देखा और उसके बारे में जानना चाहा, बाद मे उस जानकारी का प्रयोग मानव जाती के जीवन को बेहतर बनाने के लिए किया गया।

पहिया, आग, लेखन कला इन सब का प्रयोग शायद और कोई जिव कभी न कर पाते, पर इंसान ने कर दिखाया।मानव की उत्सुकता तथा सदैव नयी चीज सीखने की तत्परता ने उससे ये करवाया। ऐसे ही कुछ उदाहरण जैसे खेती करना, भवन निर्माण की कला, पशुओं को पालतू बनाना बिल्कुल असंभव सा प्रतीत होता है, पर मानव जाती ने किया। कुछ देश जो अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण सम्भ्रांत हो गये, उन्होंने ने विज्ञान, कला तथा साहित्य में काम जल्दी प्रारंभ कर दिया, ऐसे देश काफी विकसित हो गयें।

अन्य देशों तक भी बात फैली और वहाँ से भी लोग इन जगहों पर आने लगें।प्राचीन भारत भी ऐसे देशों मे एक था। कम जनसंख्या प्राचीन भारत मे सभी के पास जरूरत की चीजें थीं, तभी तो हमने खगोल शास्त्र, त्रिकोणमिति, खेती, पशुपालन, शिल्प कला, भवन निर्माण, चिकित्सा पद्धति आदि क्षेत्रों में बहुमूल्य योगदान दिया।मुगल काल के बाद, अंग्रेजी शासन के दौरान हमारी परंपरा धीरे धीरे समाप्त सी हो गई। हमने अपने महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय खो दिए। शिल्प कलाओं का विकास भी धीमा हुआ।

औद्योगिक क्रांति में भी हम पिछड़ गए, जिसका खामियाजा हम आज भी भुगत रहे हैं। देश की आजादी के बाद हमें विभिन्न जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर होना पड़ा, आज भी चिकित्सा, युद्ध, ऊर्जा इत्यादि तकनीक हम विकसित देशों से खरीदते हैं, अगर ऐसा ही चलता रहा तो हम हमेशा थोड़ा पीछे ही रह जाएंगे।
बदलाव के लिए हमें वापस से अपने प्रश्न पूछने की कला को जीवित करना होगा। अगर कोई छोटा बच्चा आपसे कोई सवाल करे तो उसे अंधविश्वास से भरे झूठे कहानियों से बचाना होगा।प्रयोगात्मक विधि से पढ़ने तथा पढ़ाने की कला पर जोर देना होगा, खास करके सरकारी विद्यालयों में शिक्षा के स्तर को सुधारना होगा। विद्यालय को आसपास के उद्योग से जोड़ना होगा, ताकि पता तो चले किताब के किस ज्ञान का प्रयोग किस उद्योग मे हो रहा है, किस उद्योग को कौन सा छात्र और प्रभावशाली बना सकता है।

यदि स्कुल के ही दिनों से बच्चों को ज्ञान का उपयोग करना, इंटर्नशिप, स्वरोजगार अदि के लिए प्रेरित किया गया तो जुगाड़ में माहिर भारतीय बच्चे भी एडिसन, टेस्ला, रॉकफेलर, मॉर्गन आदि की तरह भारत को नई तकनीक दे पाएंगे। दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता भी कम होगी और अन्य देश हमसे कुछ सीखना भी चाहेंगे। इस तरह हमारा देश भी विश्व गुरु बन सकता है।
मेरा सभी विज्ञान के शिक्षकों से अनुरोध है की वे अपनी अगली कक्षा में बच्चों को कोई प्रयोग कर दिखाये, और उन्हें सवाल पूछने को कहें, डरें मत, जवाब देने की जरूरत नहीं है, जिसने भी सवाल पूछने की हिम्मत जुटा ली है वो जवाब भी ढूंढ लेगा और आपके क्लास में भी पैदा होगा एक आइंस्टीन।

आनंद मोहन
निदेशक, कलाम अकेडमी झारखंड

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