नौ रातें, जो सिर्फ पूजा नहीं, माँ की गोद का अहसास हैं - करिश्मा

Fri, 16 Oct 2026 04:32 PM (IST)
Fri, 16 Oct 2026 06:57 PM (IST)
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नौ रातें, जो सिर्फ पूजा नहीं, माँ की गोद का अहसास हैं - करिश्मा

जब भी नवरात्रे आते है, घरों में एक अलग ही खुशबु फैल जाती हैं। सुबह-सुबह जलते हुए घी  के दीये की महक, मंदिर से आती घंटियों की आवाज़ और हवा में घुली हुई एक अजीब सी शांति। लेकिन सच कहूँ तो, नवरात्र सिर्फ नौ दिन का कोई नियम-कानून नहीं हैं। ये वे दिन हैं जब हम सब कहीं न कहीं उस माँ की तलाश करते हैं जो हमें बिना किसी शर्त के प्यार करती हैं।

अगर हम थोड़ा रुककर सोचे, तो हममें से हर कोई अपनी जिंदगी की भाग दौड़ में कहीं न कही थक चुका हैं। कोई नौकरी के तनाव  में परेशान है, कोई घर परिवार की जिम्मेदारी के बोझ तले दबा है और कोई बस अपनों के बीच खुद को अकेला महसूस कर रहा है। ऐसे में, जब ये नौ रातें आती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे ब्रह्मांड की सबसे बड़ी माँ ने अपनी बाहें फैला कर हमें पुकार कर बोला हो-“डर मत, मैं हूँ ना”।

अन्दर का महिषासुर और हमारा रोज का संघर्ष

हम पुराणों में महिषासुर की कथा पढ़ते हैं कि कैसे एक शक्तिशाली राक्षस ने सबका जीना मुश्किल कर दिया था। लेकिन क्या हमने कभी अपने अन्दर झाँक कर देखा हैं? वह महिषासुर कोई परलोक से आया राक्षस नहीं हैं,  वह आधुनिक युग का वह ‘तनाव’ और ‘अति-विचारशीलता’ हैं जो हमारी रातों की नींद छीन लेता हैं।

वह गुस्सा, जो बात-बात पर अपनों  पर निकल जाता हैं,

वह डर, जो हर वक्त अन्दर ही अन्दर हमें खाता रहता हैं,

वह अहंकार, जो हमें झुकने और गलती मानने नहीं देता,यही तो हमारे अन्दर के राक्षस हैं। और जब हम इन नौ दिनों में माँ की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं, तो असल में हम अपने अन्दर की उस कमज़ोरी को हराने की कोशिश कर रहे होते हैं। हम माँ से कहते हैं “माँ अब थक गए हैं इन बुरी आदतों से लड़ते-लड़ते अब तू ही सम्भाल ले”।

नवदुर्गा: ममता के नौ अलग- अलग रंग

माँ के ये नौ रूप कोई किताबी बातें नहीं हैं, यह तो हमारे जीवन के अलग-अलग पड़ावों जैसे हैं:

• शैलपुत्री की तरह हम जिंदगी में हर बार गिरकर फिर से उठना सीखते हैं। 

• ब्रह्माचारिणी की तरह चुप चाप अपनी मेहनत और तपस्या में लगे रहते हैं, बिना किसी शोर के। 

• स्कंदमाता की तरह जब हम अपने बच्चों को सीने से लगाते हैं, तो हमें समझ आता है कि ममता असल में होती क्या है। 

• और जब कभी जिंदगी बहुत अंधेरी लगने लगती हैं, तो कालरात्रि बनकर माँ हमें यह सिखाती हैं कि अंधेरे के बाद ही उजाला आता हैं। 

ये नौ देवियाँ आसमान मैं बैठी कोई मूर्तियाँ नहीं हैं। ये हमारे ही घर की उन महिलाओं - माँ, बहन, बेटी, पत्नी का अक्स हैं जो खुद भूखी रहकर सबको खिलती हैं, जो खुद दर्द सहकर परिवार को हँसाती है। जब हम कन्या पूजन में छोटी बच्चियों के पैर धोते हैं, तो सच पूछिये तो हम अपनी ही आने वाली पीढ़ी को यह एहसास करा रहे होते है कि उनका होना इस दुनिया की सबसे बड़ी नेमत हैं।

खुद से जुड़ने का मौका

लोग कहते है की नवरात्र में उपवास रखने से शरीर डीटॉक्स होता है, सेहत अच्छी रहती हैं। बात बिल्कुल सही है। लेकिन मुझे लगता है कि इससे भी ज्यादा हमारी आत्मा का डीटॉक्स होता हैं।

पूरे साल हम दुनिया भर की फ़ालतू की बातें, शिकायतें और भागदौड़ में उलझे रहते हैं। ये नौ दिन हमें रुकना सिखाते हैं। थोड़ा थमकर सास लेना सिखाते हैं। घर की साफ़ सफाई के बहाने हम अपने मन की जमा धूल को भी झाड़ देते हैं। दो वक़्त की रोटी छोडकर जब हम सिर्फ फलाहार या सात्विक भोजन करते हैं, तो शरीर हल्का हो जाता हैं और मन में एक अजीब सा ठहराव आ जाता हैं।

अंत में

ये नौ रातें हमें सिर्फ ये याद दिलाने आती है कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यूँ न हो, उजाला हमेशा जीतता हैं। जब हम इन दिनों में दिया जलाते हैं, तो वह सिर्फ मिट्टी के दीये की लौ नहीं होती, वह आपके उस विश्वास का दिया होता हैं जो आपको अन्दर से कमज़ोर नहीं होने देता। इस नवरात्र में  सिर्फ पूजा की औपचारिकता न निभाये, थोड़ा वक्त खुद के साथ बैठिए, अपनी कमजोरियों को गले लगाइए और महसूस कीजिए कि कोई हैं जो बिना कुछ कहे, आपकी हर अनकही बात सुन रहा हैं।

तो इस बार जब आप कलश स्थापना करें,  तो सिर्फ बाहरी अनुष्ठान न करें—अपने भीतर की देवी को जगाएं। क्योंकि माँ  का होना ही इस बात का एहसास कराता है कि आप अकेले नहीं हैं।

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-करिश्मा  

JR Choudhary JR Choudhary serves as the Editor of Marudhar Bharti, where he leads the editorial team with a focus on accuracy, transparency, and public interest journalism. With over 8 years of hands-on experience in the media industry, he has developed a deep expertise in news analysis, regional reporting, and editorial management. His core mission is to uphold the highest standards of journalistic ethics while delivering stories that matter to the public.